माया का आवरण

 


 



सेठ शांतिलाल धार्मिक प्रवृत्ति के होने के बावजूद लोभी किस्म के इनसान थे। उन्हें ज्ञात हुआ कि स्वामी सुखानंद के पास लोहे को सोना कर देने वाली पारसमणि है तो उसे प्राप्त करने हेतु उनके आश्रम में जा पहुंचे। उन्होंने स्वामी जी से प्रार्थना की कि मुझे अपनी आत्मा को परमात्मा से मिलाना है, कुछ समय आपके साथ रहना चाहता हूं। वहां रहकर सेठ जी प्रभु भक्ति और स्वामी जी की सेवा में जुट गए। वर्षों बीतने के पश्चात उन्होंने स्वामी जी से वापसी की आज्ञा चाही तो स्वामी जी ने उनकी सेवा से प्रसन्न होकर उनसे कुछ मांगने को कहा। सेठ जी ने बेझिझक पारसमणि की मांग कर दी। स्वामी जी ने उनसे अलमारी में रखी संदूकची लाने को कहा। सेठ जी सोचने लगे कि जब पारसमणि लोहे की संदूकची को सोना ना कर सकी तो मैं ही इसे लेकर क्या करूंगा। संदूकची स्वामी जी को लौटाते हुए सेठ जी ने अपनी शंका व्यक्त की। इस पर स्वामी जी ने संदूकची खोलकर कपड़े में लिपटी पारसमणि सेठ जी के हाथ पर रख दी और बोले-जब तक इस पर कपड़े का आवरण था, तब तक इस पर लोहे का स्पर्श नहीं हो पा रहा था। इसी प्रकार जब तक हमारी आत्मा पर लोभ और माया का पर्दा पड़ा है तब तक आत्मा का परमात्मा से मिलन असंभव है। सेठ को अपनी भूल का अहसास हुआ और वह पारसमणि वहीं वापस रखकर अपनी दुनिया में लौट गए।


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