मोदी सरकार को रिजर्व का सहारा


भारतीय रिजर्व बैंक ने लाभांश, सरप्लस और कॉन्टिंजेंसी फंड से सरकार को 1.76 लाख करोड़ रुपये ट्रांसफर करने का जो फैसला किया है, उसे अप्रत्याशित नहीं कहा जा सकता। लंबे समय से यह सवाल सार्वजनिक चर्चा का विषय बना हुआ था और इस पर जिम्मेदार अधिकारियों और विशेषज्ञों की राय बंटी हुई थी। ऐसे में विमल जालान समिति की सिफारिशों की रोशनी में आरबीआई बोर्ड ने जब इतनी बड़ी राशि सरकार को सौंपने का फैसला किया है तो उस पर सवाल उठने लाजिमी हैं। खासकर इसलिए भी कि इससे पहले कठिन से कठिन परिस्थिति में भी रिजर्व बैंक ने ऐसा फैसला नहीं किया था।
बहरहाल, यह कतई जरूरी नहीं है कि परिस्थिति की जटिलताओं से जूझते हुए कोई सरकार या संस्था हमेशा वैसे ही कदम उठाए जिनकी मिसाल अतीत में मौजूद हो। देखने की बात यह है कि जो कदम उठाया जा रहा है, वह कितना जरूरी है और उससे जुड़े जिन खतरों की ओर इशारा किया जा रहा है उनसे बचने की तैयारी कैसी है। निश्चित रूप से अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर हम एक कठिन दौर से गुजर रहे हैं। न केवल कई उद्योगों के आंकड़े कठिन स्थिति का संकेत दे रहे हैं बल्कि सरकार की राजस्व वसूली भी उम्मीद से कम है। ऐसे में जब सरकार पर इन्फ्रास्ट्रक्चर में अधिक से अधिक निवेश के जरिए मांग पैदा करने का दबाव है, तब फंड की कमी उसके हाथ बांध दे रही है।
यानी फैसले के बाद आरबीआई का आपातकालीन कोष उसकी कुल पूंजी का महज 5.5 फीसदी रह गया है। विशेषज्ञों की समिति ने देश-दुनिया के मौजूदा हालात पर विचार करने के बाद ही यह जोखिम लिया है, साथ ही यह भी स्पष्ट कहा है कि ऐसा फैसला बार-बार संभव नहीं होगा। इससे आगे यही देखने को बचता है कि इस रकम का सर्वश्रेष्ठ इस्तेमाल कैसे सुनिश्चित किया जाए। 
जाहिर है, इस मामले में सबसे अहम भूमिका खुद सरकार की होगी। इस आकस्मिक सहायता ने बजट घाटे से निपटना उसके लिए आसान बना दिया है, लेकिन असल चुनौती उसके सामने यह है कि रिजर्व बैंक से मिली इस राशि के जरिए वह इकॉनमी को गति कैसे दे और लोगों की नौकरियां बचाने तथा नई नौकरियां पैदा करने में कामयाबी कैसे हासिल करे


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